Monday, September 5, 2011

मुर्राह पर संकट





फिरदौस ख़ान
देश में श्वेत क्रांति की वाहक मुर्राह नस्ल की भैंसें इन दिनों ब्रुसलोसिस नामक एक घातक बीमारी की चपेट में हैं। इसके चलते इन भैंसों को जहर का इंजेक्शन देकर मौत के घाट उतारा जा रहा है। पशु विशेषज्ञों का कहना है कि पशु पालकों को मुर्राह नस्ल की भैंसों की समय-समय पर स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए, जिससे समय पर इस बीमारी का पता लग सके।

गौरतलब है कि हरियाणा के हिसार स्थित राष्ट्रीय भैंस अनुसंधान केंद्र को वर्ष 2003 में मुर्राह नस्ल को विकसित करने का काम सौंपा गया था। इसके लिए अनुसंधान केंद्र ने 50 से 60 हजार रुपए प्रति भैंस के हिसाब से 60 भैंसें खरीद कर अनुसंधान शुरू कर दिया था। इसके करीब चार साल बाद अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों को पता चला कि 31 भैंसें ब्रुसलोसिस नामक बीमारी की चपेट में हैं। इनमें से पांच भैंसंे पूरी तरह से इस घातक बीमारी का शिकार हो चुकी हैं। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन पांचों भैंसों को एनीथिसिया का इंजेक्शन लगाकर मौत की नींद सुला दिया गया। इसके बाद समय-समय पर भैंसों की स्वास्थ्य जांच की जाती रही। राष्ट्रीय भैंस अनुसंधान केंद्र में बीमार भैंसों को अलग रखा जाता है, ताकि अन्य भैंसें इस बीमारी का शिकार न हो सकें।

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय वेटरनरी र्साईंंस विभाग में ब्रुसलोसिस विशेषज्ञ डॉ. पूर्ण चंद के मुताबिक ब्रुसलोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में आमतौर पर पशु पालकों को जानकारी नहीं होती। इसमें पशु पहले की तरह ही खाता-पीता है और गर्भ धारण करता है, लेकिन आठवें महीने में अचानक उसका गर्भपात हो जाता है। गर्भपात के बाद भी भैंस फिर से गर्भ धारण कर सकती है, लेकिन गर्भपात के कारण उसके शरीर में दाखिल हो चुके बैक्टीरिया दूध के जरिये बाहर आने शुरू हो जाते हैं। हालत इतनी गंभीर है कि बीमारी की चपेट में आए पशु के पास जाने सेभी मनुष्य इस बीमारी का शिकार हो सकता है। बीमारी के पहले चरण में मनुष्य को हल्का बुखार, जोड़ो का दर्द या कंपकंपी होती है। जल्द उपचार न मिलने पर मरीज नपुंसक हो सकता है। इतना ही नहीं ब्रुसलोसिस से पीडित़ भैंस का दूध पीने से भी मनुष्य को यह बीमारी लग सकती है, क्योंकि दूध में पाए जाने वाले बैक्टीरिया मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक हैं। राष्ट्रीय भैंस अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. बाजिया मानते हैं कि संस्थान की कई भैंसें ब्रुसलोसिस की चपेट में हैं। उन्होंने इस बात की भी पुष्टि की कि ब्रुसलोसिस से पीड़ित पांच भैंसों को एनीथिसिया की ज्यादा डोज देकर मारा गया। मगर इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बीमार भैंसों को अलग रखने का यह मतलब नहीं है कि उन्हें भी एनीथिसिया की ज्यादा डोज देकर मारा जाएगा। ब्रुसलोसिस की जांच की प्रक्रिया काफी लंबी है। राज्य पशुपालन विभाग और हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इन भैंसों की जांच के काम में लगे हुए हैं। अगर इनमें भी ब्रुसलोसिस नामक बीमारी पाई जाती है तो इस संबंध में कोई भी कार्रवाई करने से पहले राज्य सरकार की अनुमति ली जाएगी। इससे पूर्व पांच भैंसों को एनीथिसिया का इंजेक्शन लगाने से पहले राज्य सरकार की अनुमति ली गई थी।

मुर्राह भैंसों में ब्रुसलोसिस के मामले पाए जाने के बाद हरियाणा के पशु पालकों में खौफ पैदा हो गया है, जबकि पशु विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय भैंस अनुसंधान केंद्र के अलावा प्रदेश के किसी अन्य हिस्से में ऐसा कोई मामला फिलहाल सामने नहीं आया है, इसलिए पशु पालकों को डरने की कोई जरूरत नहीं है। गौरतलब है कि ग्रामीण क्षेत्रों में किसी व्यक्ति की संपन्नता को पशुधन से आंका जाता रहा है। इसलिए ग्रामीण आंचल में यह कहावत प्रचलित है कि ‘जिसके घर में काली, उस घर सदा दिवाली।’ काबिले-गौर यह है कि हरियाणा दुनिया की सबसे अच्छी मुर्राह भैंस के लिए विख्यात है। मुर्राह भैंस की बदौलत ही हरियाणा में दूध की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन औसत खपत (660 मि.ली.) राष्ट्रीय स्तर (232 मि.ली.) के मुकाबले करीब तिगुनी है।
हरियाणा सरकार मुर्राह नस्ल की भैंस के संरक्षण व विकास के लिए सतत् प्रयास कर रही है। सरकार के इस प्रयास को सफल करते हुए किसानों ने अतिरिक्त आमदनी के लिए खेती के अलावा इस बेहतरीन नस्ल की भैंसों का पालन करके अपने घर को संपन्न बनाया है। प्रदेश सरकार की विशेष पुरस्कार योजना के तहत सरकार की ओर से 15 से 18 किलोग्राम दूध देने वाली मुर्राह भैंस पालक को पांच हजार रुपए और 18 किलोग्राम से ज्यादा दूध देने वाली मुर्राह भैंस के पालक को छह हजार रुपए दिए जाते हैं। पशु पालकों से मुर्राह भैंस के कटडे़ नस्ल सुधार के लिए पशुपालन विभाग के माध्यम से प्रदेशभर में ग्राम पंचायतों को आवंटित किए जाते हैं। इसके अलावा देश के अन्य प्रदेशों के पशुपालक भी नस्ल सुधार के लिए कटडे़ खरीदने यहां आते हैं।

एनडीआरआई के वैज्ञानिकों ने हरियाणा की विभिन्न प्रजातिों के दुधारू पशुओं पर शोध किया. रिसर्च के दौरान पाया कि प्रदेश के करीब 30 फीसदी पशुओं के दूध में अशुद्धता है. इनके दूध में कीटाणुओं की संख्या ज्यादा है. ये लोगों मंे विभिन्न बीमारियों का कारण बन रहे हैं। इनमें बेक्टीरिया माइक्रो, बेक्टीरिया सेलोमूनेला, हंटा वायरस और इंस्टाफलोकोसियस आदि शामिल हैं।
डनका कहना है कि सिर्फ थन को साफ करने से ही दूध साफ नहीं हो सकता। दूध को निकालने से पाचं से 10 मिनट पहले तक पशु को बैठने नहीं दिया जाता, क्योंकि इस दौरान थन के सुराख खुले होते हैं। अगर इस दौरान पशु बैठ गया तो कीटाणु उसके थनों में चले जाएंगे। कच्चा दूध पीने से बचना चाहिए। दूध को उबाल कर ही पिएं, ताकि उसमें मौजूद कीटाणु नष्ट हो जाएं। उनका यह भी कहना है कि खेतों छिड़के जाने वाले कीटनाशकों के कारण चारे में रसायन के तत्व आ जाते हैं और फिर यही चारा पशु खाते हैं। इस चारे से ये रसायन पशुओं के शरीर में चले जाते हैं और फिर दूध में शामिल हो जाते हैं।

स्पेनिश मोरोक्कन टीम के वैज्ञानिकों के मुताबिक पशुओं के दूध में 20 से ज्यादा घातक रसायनों का पता चला है। पशुओं को दी जाने वाली दवाओं के तौर पर नीफ्ल्यूमिक एसिड, मेफेनामिक एसिड और केटोप्रोफीन तत्व दूध में शामिल हो गए हैं। शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि कुछ दवाएं और उत्पाद बढ़ाने वाले तत्व पशुओं को दिए गए या खेत पर चारे को खाने के दौरान उनके शरीर में पहुंच गए। सबसे ज्यादा मात्रा गाय के दूध में मिली है। लगातार शरीर में जाने पर ये दवाओं को तो बेअसर करते ही हैं। साथ ही हमारी कार्यक्षमता को कम कर हमें बीमार भी बना सकते हैं। इसके अलावा ये तत्व शारीरिक विकार भी पैदा कर सकते हैं।
पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्यपालन विभाग में संयुक्त सचिव दिलीप रथ के मुताबिक दुनियाभर के दुग्ध उत्पादक देशों में भारत का पहला स्थान है। लाखों ग्रामीण परिवारों के लिए दुग्ध व्यवसाय आय का दूसरा महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। रोजगार प्रदान करने और आय के साधन पैदा करने में दुग्ध व्यवसाय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। वर्ष 2007-08 के दौरान देश में प्रति दिन दूध की खपत 252 ग्राम थी। पिछले तीन दशकों में योजना के अंत तक दुग्ध उत्पादन की विकास दर करीब चार फीसदी थी, जबकि देश की जनसंख्या की वृध्दि दर तकरीबन दो फीसदी थी। दुग्ध उत्पादन में वृध्दि के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा शुरू की गई अनेक योजनाओं के कारण ही मुमकिन हो सका है। उनका कहना है कि आजादी के बाद इस दिशा में जो प्रगति हुई है, वह बहुत चमत्कार पूर्ण है। तब से दुग्ध उत्पादन में छह गुनी वृध्दि हुई है। वर्ष 1950-51 में कुल एक करोड़ 70 लाख टन दूध का उत्पादन होता था जो कि 2007-08 तक बढ़कर 10 करोड़ 48 लाख टन पहुंच गया। देश में सामाजिक-आर्थिक बदलाव लाने में इसे एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में देखा जाता है। देश में दुग्ध व्यवसाय को कृषि के सहायक व्यवसाय के रूप में देखा जाता है। देश के करीब सात करोड़ ग्रामीण परिवार दुग्ध व्यवसाय में लगे हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 70 फीसदी मवेशी छोटे, मझौले और सीमान्त किसानों के पास हैं, जिसकी पारिवारिक आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा दूध बेचने से प्राप्त होता है। सरकार दुग्ध उद्योग क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनायें चला रही है। दुग्ध व्यवसाय की प्रगति हेतु सरकार सक्रिय सहयोग दे रही है। इसकी शुरुआत 1970 में शुरू किए गए आपरेशन फ्लड योजना के तहत आई श्वेत क्रांति से हुई। इस योजना ने सहकारी क्षेत्र में दुग्ध व्यवसाय को अपना कर किसानों को अपने विकास का मार्ग प्रशस्त करने में और एक राष्ट्रीय दुग्ध ग्रिड के जरिये देश के 700 से अधिक शहरों और कस्बों में उपभोक्ताओं तक दूध पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इससे बिचौलिए की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो गई है और इस कारण हर मौसम में दूध के मूल्यों में जो उतार-चढ़ाव हुआ करता था, वह भी समाप्त हो गया है। सहकारी ढांचे में कारण दुग्ध और उससे बने पदार्थों र्का उत्पादन और वितरण किसानों के लिए काफी सरल और स्वीकार्य हो गया है। इस कार्यक्रम में राज्यों के 22 सहकारी दुग्ध संघों के तहत 170 दुग्धशालाएं ( मिल्क शेड) शामिल थीं, जिनसे एक करोड़ 20 लाख कृषक परिवारों को ला हुआ। ‘आपरेशन फ्लड’ के समाप्त होने पर दुग्ध उत्पादन प्रति वर्ष दो करोड़ 12 लाख टन से बढ़कर छह करोड़ 63 लाख टन तक पहुंच गया। इस कार्यक्रम के तहत 265 जिलों को शामिल किया गया था। इसके अलावा सरकार दुग्ध व्यवसाय को लोकप्रिय बनाने और इससे जुड़े पहले छूट गए अन्य क्षेत्रों को सम्मिलित करने के लिए राष्ट्रीय मवेशी (गोधन) और भैंस प्रजनन परियोजना, सघन डेयरी विकास कार्यक्रम, गुणवŸाा संरचना सुदृढ़ीकरण एवं स्वच्छ दुग्ध उत्पादन, सहकारिताओं को सहायता, डेयरी पोल्ट्री वेंचर कैपिटल फंड, पशु आहार, चारा विकास योजना और पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम जैसी अनेक परियोजनाओं पर काम कर रही है।
बहरहाल, इस वक्त मुर्राह भैंसों की बीमारी पशु पालकों के लिए समस्या बनी हुई है। अगर जल्द ही इस बीमारी पर काबू नहीं पाया गया तो इससे श्वेत क्रांति को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। इसके लिए जरूरी है कि पशु पालकों को जागरूक किया जाए।

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