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Monday, December 5, 2011

जल, जंगल और जमीन का जनादेश


यात्रा मार्ग से ........
पी.वी. राजगोपाल
आंध्रप्रदेश में कई परेशानियां है लेकिन इस बात को अनदेखा नही किया जा सकता है कि यहां की कई खुबियां भी हैं। अगर आप कहीं बाजार से गुजर जाएं तो आपकी नजर किसी फल वाले दुकान में जरूर पडे़गा । जितनी सुन्दरता से केले के पूरे गुच्छे को आकर्षक ढ़ंग से बांध कर रखतें है वह अन्य राज्यों के तुलना में भिन्न है । आंध्रप्रदेश मुर्तियों का भी राज्य है इतने सारे मूर्तियों को दुसरे को प्रांतों में आप नही देखेगें। सभी नेताओं की मूर्तियां बड़े तादात में हर शहर में दिखाई पडे़गा । कहीं कहीं तो ऐसा लगेगा जैसे कहीं मूर्तियों की बगीचा बना दिया हो । वैसे तमिलनाडु और केरल में फलैक्स का ज्यादा प्रचलन है तमिलनाडु में तो इस हद तक की हर व्यक्ति शादी मे,ं जन्म दिन में और मुंडन कार्यक्रम में भी अपना अपना फलैक्स बनाकर बाजार में लगाते हैं । आंध्रप्रदेश के दलित आंदोलनों में कारण करीब करीब हर शहर में अम्बेडर भवन है, और अम्बेडर जी की मूर्तियां है । मूर्तियां अकसर प्रेरणा के स्रोत बनते हैं लेकिन अगर उसकी रख रखाव ठीक से ना हो तो मूर्तियों के साथ असम्मान जैसा दिखाई पड़ता है । देश भर में कई जगह गांधी जी की मूर्ति का सही रख रखाव नही होने के कारण बहुत खराब हालत में दिखाई पड़ा । मूर्तियों की स्थापना और रख रखाव को लेकर एक अच्छी समझ बननी चाहिए । किसी भी शहर में किसी भी समूह के माध्यम से मूर्तियां लगायी जाय ? इसकी रख रखाव की जिम्मेवारी भी उन्ही पर निर्धारित होना चाहिए । जैसे राष्ट््रीय झंडा केे लिए कुछ नियम निर्धारित है वैसे ही कुछ निर्धारण मूर्तियों के लिए भी होना है ।
तमिलनाडु और केरल के तुलना में हमारे सभाओं में पुलिस और खुफिया विभाग की उपस्थिति न के बराबर रही । तमिलनाडु और केरल में खुफिया विभाग के तौर तरीके से थोड़ी सी असुविधा होती थी । लोगों की समस्याओं से अधिक उन्हे यात्रियों का फोटों खिचनें का शौक था सीधे सीधे बात करके जानकारी लेने के बदले यात्रियों के बारे में इधर उधर पुछने की भी उनकी आदत थी । इस कारण से मुझे एक बार उनके तौर तरीक के बारे में लेख भी लिखना पड़ा । लेकिन आंध्रप्रदेश में नक्शल प्रभावित क्षेत्र हो या तेलंगाना आंदोलन से प्रभावित क्षेत्र हो कही भी पुलिस खुफिया विभाग ने यात्रा को लेकर कोई खलबली नही मचाई । आम जनता को अपनी बात कहने की आजादी इस प्रांत में शायद अधिक है । इसी प्रकार यात्रा के स्वागत में अधिकतर बैठकें सरकारी भवनों में ही की गई । जहां बैठकर निरन्तर गरीब लोगों ने सरकार के बारे में शिकायत दर्ज कराई । मुझे केरल प्रांत के कासरकोड शहर की याद आयी, जहां हमारे पहुंचते ही खुफिया विभाग और पुलिस विभाग के लोग दौड़कर पहुंच गये । फोटो खिचने लगे साथ चलने वाले विदेशी मित्रों के पासपोर्ट मांगने लगे । उनके लिए आम जनता की समस्याओं से ज्यादा मतलब इस बात से है कि कौन आता है कौन जाता है । देश की सुरक्षा के ड््रामा में लगे हुए इन कर्मचारियों को इस बात की तनिक भी फ्रिक नही है कि आम लोग जिन परेशानियों को लेकर चर्चा कर रहे है । इससे पूर्व जब मै कासरकोड शहर का भ्रमण करने आया, उस समय जिला कलेक्टर से मिलकर निवेदन किया था, कि वे आदिवासियों की भूमि की समस्या जल्दी हल करंे । समस्या तो साल भर में हल नही हुए लेकिन कौन समस्याओं के बारे में पुछने आते हैं ? इस बात को लेकर फ्रिक जरूर है । यही हालात छतीसगढ़ जैसे प्रांत में भी है । लोगों के समस्या हल करने में सरकार को बिलकुल रूचि नही है । लेकिन समस्याओं पर चर्चा करने वालों को नक्सली समर्थक घोषित करने में पूरा तंत्र लगा हुआ है । ऐसा लगता है कि किसी को भी नक्सली समर्थक कहने से वह अपने जिम्मेवारियों से बच जायेंगे ।
आंध्रप्रदेश में एक खूबी यह रही कि इस बार यात्रा में मार्क्सवादी, गांधीवादी, अम्बेडकरवादी हम सब लोग एकजुट हुए । इस बात पर भी हमारी सहमति बनी कि वादों से उपर उठकर सबकी ताकत आम जनता की समस्या हल करने में लगनी चाहिए । प्रेरणा कहां से मिली है इस बात को लेकर लड़ने के बदले प्रेरणा को लेकर हम क्या कर रहें हैं, उस पर ध्यान देने की जरूरत है जिस देश में 40 प्रतिशत लोग गरीबी से पीड़ित है वहां हम अपने अपने प्रेरणा स्रोतों को बहस के द्वारा सबसे अच्छा साबित कर भी दिया तो गरीबों को क्या लाभ होने वाला है । उन्हें तो इस बात की फ्रिक है । कि उनका अगला भोजन कहां से आयेगा । आस पास के दादाओं से कौन बचायेगा ? सर्वधर्म समभाव के बारे में हम अकसर यही कहते हैं कि प्रेरणा किसी भी गुरू से मिली हो, या किसी भी भगवान से लेकिन सवाल यह है कि आप करते क्या हो ? समाज में नफरत और अंशाति फैलाते हों या शांति और समानता ।
आंध्रप्रदेश के विशेष आर्थिक क्षेत्र और उससे जूड़ विस्थापन पर मैंने अलग से लिखा है । लेकिन भूमि सुधार को लेकर वारंगल जिले में जो उससे जूड़ अच्छा काम दिखाई उसके बारे में यहां लिख रहा हूं । वारंगल जिला एक समय नक्सल प्रभावित इलाका रहा है, लेकिन अब नक्सल प्रभावित गांव में ही भुमि सुधार का उपयोगी काम हो रहा है । जिला कलेक्टर श्री राहुल और संयुक्त कलेक्टर सुश्री करूणा ने मिल कर कुछ गांव के दीवारों में जमीन से संबंधित सब जानकारियों को लिखने लगे हैं । हर व्यक्ति इस चार्ट को देखकर समझ सकते है कि किसकी भूमि कहां और कितना है । अगर कोई ऋटि हो तो सुधारने के लिए आवेदन दे भी सकते हैं । कलेक्टर कार्यायल में ही भूमि सेल की स्थापना की है । कुछ वकीलों को इस काम में मद्द करने और उनके शिकायतों को देखने के लिए नियुक्त किये हैं । आम जनता के समस्याओं के प्रति संवेदनशील इन वकीलों से मिलकर और उनकी बात सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ । हर जिलों में जरूर ऐसे वकीलों की टोली मिल सकती है । जिला प्रशासन से प्रोत्साहन मिलने से कई लोग इस प्रकार काम करने के लिए सामने आयेंगे । जिला प्रशासन के मुखिया जब आम लोगों की काम में रूचि लेने लगते हैं तब उनके नीचे काम करने वाले तमाम कर्मचारी भी रूचि लेने लगते हैं । वारंगल में करीब करीब यही हो रहा है । जिस तहसीलदार के कार्यालय का हमने भ्रमण किया वहां तमाम कर्मचारी आम जनता के प्रति संवेदनशील दिखाई पड़ा । जानकारियों को सुलभ कराने में और आम जनता के समस्याओं पर चर्चा करने के लिए अगर सरकारी कर्मचारी तैयार हो जाय तो आधी समस्या वैसे ही हल हो जायेगी । इसके विपरित अगर प्रशासन के मुखिया स्वंयम बहुराष्ट्रीय, राष्ट्रीय कंपनियों के दलाल जैसा व्यवहार करना शुरू करे तों पूरी प्रशासनिक ढ़ाचा उसी ओर मुडेंगें । वारगंल में एक और अच्छा काम हुआ है । प्रशासन ने वन विभाग व राजस्व विभाग को साथ बैठाकर आपसी विवादों को सुलझाना शुरू कर दिया है । विभागों के आपसी विवादों के कारण जमीन जोतने वाले कई लोग परेशान है । वन विभाग निरन्तर इन्हे परेशान कर रहे हैं और इनके खेतों में वृक्षारोपण कर रहे हैं । जिला प्रशासन के संयुक्त प्रयास से एक तरफ राजस्व विभाग के जमीन पर बसे हुए लोगों को सुरक्षा मिली है तो दुसरी ओर वन विभाग के जमीन पर बसे हुए लोगों को भूमि स्वामित्व मिला है तो दूसरी ओर वन विभाग के जमीन को जोतने वालों को फसल बचाने का मौका मिल जाता है । अगर यह प्रयोग वारंगल के कुछ गांव में हो सकता है तो देश के हर गांव में हो सकता है । जब देश के 70 प्रतिशत लोग खेती के काम में लगे है तो किसानों की समस्या हल करने के लिए इतना तो प्रयास हर सरकार को करना ही चाहिए । मध्यप्रदेश जैसे प्रांत में लाखों एकड़ जमीन विभागीय विवादों में फंसा हुआ है । जो वारंगल के कलेक्टर कर सकते हैं वही काम मध्यप्रदेश के कलेक्टर से भी कराया जा सकता है । मुझे यह डर जरूर लगा है कि जैसे जैसे आदिवासियों और दलितों की समस्या हल करने के में तभी आगे बढ़ेंगे । वैसे ही वारंगल के ताकतवर लोग उन्हे हटाने के अभियान में भी जूड़ेंगे । इस खतरे से मुक्ति तभी मिलेगी ? जब हर दल के नेता इस बात के लिए कमर कस लेंगे ? कि अब हमें सिर्फ बड़े लोगों को ही नही बल्कि वंचितों को भी न्याय दिलाना है । जिस देश के न्याय व्यवस्था निरन्तर सिर्फ पैसे वालों के लिए ही काम करेंगे, उस व्यवस्था को बदलना ही सही तरीका है । सवाल सिर्फ यह है कि इस बड़ी चुनौती को स्वीकारने के लिए कौन सी पार्टी तैयार है ?
आंध्रप्रदेश में बहुत दिनों से तेलंगाना आंदोलन चल रहा है । आंदोलनकारियों का कहना यही है कि संयुक्त प्रांत में उनके साथ न्याय नही हो रहा है ? इसलिए उन्हे अगल प्रांत चाहिए । ऐसा कई आंदोलन हमने पहले भी देखा है । आंदोलन के कारण छतीसगढ़, उतराखण्ड और झारखंड बना । कोई भी साधारण व्यक्ति इस बात को जांच सकते हैं कि छोटे प्रांत बनने से आम लोगों को कोई राहत मिली की नही मिली । इन प्रांतों में लोग कहने लगे हैं कि इससे अच्छा तो पहले था । छोटे प्रांतों में संसाधनों की जिस प्रकार की लूट मची है उसे देखकर घबराहट होने लगती है । विकास के नाम पर जल,जंगल, जमीन सब कुछ छीना जा रहा है । राष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में जीवन जीने के तमाम संसाधन सौंपा जा रहा है । कानून और नियम के धज्जियां उठा रहा है । विरोध करने वाले लोगों को पुलिस और गुण्डों के बल पर दबाया जा रहा है । यह सब कुछ विकास के नाम पर किया जा रहा है । मैं अपने मित्रों को सतर्क करने का प्रयास किया हूं कि छोटे प्रांत की कल्पना अपने आप में समस्याओं का हल नही है । छोटे प्रांत के आंदोलन के दरमियान अगर उन वंचितों के जीवन से जूड़े मुद्दों पर बहस नही होगी तो प्रांत बनने के बाद भी सरकार और वंचितों को कुछ नही मिलेगा । प्रांत तो बनेगा ? मंत्री मंडल भी होगें और तमाम सरकारी कर्मचारी भी नियुक्त होंगे आम जनता तब भी आवेदन लेकर हाथ जोडकर दर दर भटकते हुए दिखाई पड़ेगें । जैसे रायपुर में या रांची में हो रहा है, उसी प्रकार राजधानी और एयरपोर्ट के बनाने के लिए हजारों मजदुर और किसानों की कुर्बानी होगी । हवाई जहाज से सूटकेस लेकर उतरने वाले लोग तमाम जमीन खरीदेंगे । उस समय अन्याय के विरोध करने वालों पर अधिक दमन होगा । जैसे आज छतीसगढ़ और झारखंड में हो रहा है । छोटे प्रांत के सपना लेकर लड़ने वालों को अभी से सतर्क रहेना होगा । और जहां जहां नये प्रांत बने है वहां से सबक सीखना होगा ।
बुंदेलखण्ड प्रांत के नाम लड़ने वाले मेरे उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के मित्रों से भी मैं बार बार यही निवेदन करता हूं कि आंदोलन के कोख में ही परिवर्तन वादी बीज डालिए, अन्यथा एक राक्षस और पैदा होगा जो पहले से भी खतरनाक हो सकता है । विकेन्द्रीत सत्ता ही अगर हमारी आवश्यकता हो तो सबसे जरूरी ग्राम सभा को मजबूत करने का है । ग्राम सभा, विधान सभा और लोक सभा इसके अलावा और कोई सभा की जरूरत नही है । इसी तीन स्तर पर समस्यांए हल होनी चाहिए ।
आंध्रप्रदेश में दलित आंदोलन ताकतवर रूप में है पूरे 15 दिन के यात्रा में दलित आदिवासी मछुआरे और घुमंतु आदिवासियों के बीच में ही रहने का मौका मिला । कई सभा में दलित संगठनों के और वामपंथी दलों के स्थानीय लोग साथ-साथ उपस्थित हुए । गांधी जी ने जो ताबीज दी है ? उसके अनुसार सभी गांधीजनों को वही जगह काम करने की जरूरत है । पर जिनके बीच होकर हम हम गुजर रहे थे, जैसे गांधी के नाम लेने वाले राजनैतिक दल वंचित और पीडीतो से दूर हो गये, वैसे ही गांधी जी के नाम पर काम करने वाले सामाजिक संगठन भी धीरे धीरे आदिवासियों से, दलितों से, मछुवारों से दूर तो नही जा रहे हैं, गांधीजनों को इन बात पर गंभीरता से विचार करना होगा । समाज परिवर्तन के काम में लगे हुए लोगों को यह समझना ही होगा । हमारे बुद्धि और शक्ति की जरूरत उन्ही लोगों को अधिक है, जो आजाद भारत में आज भी गुलाम हैं । हमारी कार्यशैली में जो कमी है इसी के ही कारण गांधी जी वंचित समाज से दूर होते जा रहे हैं । गांधी जी को वंचितों के करीब ले जाने का दायित्व उन सबका है जो गांधी जी का नाम लेकर समाज में काम कर रहे हैं ।

Monday, November 14, 2011

रेणुका बांध, विनाशकाले विपरीत बुद्धि


मीनाक्षी अरोड़ा और सिराज केसर

दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) हिमाचल प्रदेश पॉवर कार्पोरेशन लिमिटेड (एचपीपीसीएल) के साथ मिलकर अपनी पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए ददाहू कस्बे के पास गिरि नदी पर एक बांध बनाने की कोशिश में जुटा है। यह कस्बा हिमाचल के सिरमौर जिले में है। गिरि नदी पर बन रहे रेणुका बांध के तुगलकी फरमान के तहत ददाहू (सिरमौर, हिमाचल) के 37 गांवों के कम से कम 6000 लोग विस्थापित होंगे, 1600 हेक्टेअर जमीन बांध में जलमग्न हो जायेगी, जिनमें ज्यादातर अति उपजाऊ जमीनें या घने जैवविविधता वाले जंगल हैं। गिरि नदी यमुना नदी की सहायक नदी है। इस स्थान पर 148 मीटर ऊंचे बांध बनने का मतलब है काफी घरों, खेतों- जंगलों और रेणुका वन्यजीव अभ्यारण्य के भी एक हिस्से को डूब जाने का खतरा।

148 मीटर ऊंचे बांध की वजह से लगभग 24 किमी. लंब कृत्रिम जलाशय बनेगा और उसमें डूब जायेंगे 18 लाख पेड़। रेणुका बांध निर्माण में गलतबयानी के कई नमूने उजागर हुए हैं। रेणुका बांध संघर्ष समिति के पूरनचंद कहते हैं कि किसी भी तरह गिन लीजिए 15 लाख पेड़ से ज्यादा ही बैठेगा। हुआ वही। एचपीपीसीएल ने डूब क्षेत्र में पेड़ों की गिनती करने के लिए शुरू में जिन ठेकेदारों को रखा था उन्होंने लगभग 18 लाख पेड़ बताए। एचपीपीसीएल के नौकरशाहों को लगा कि इतने ज्यादा पेड़ों की गिनती बांध परियोजना को फॉरेस्ट क्लीयरेंसमिलने में दिक्कत पैदा करेगा। यह जानकारी आम जन तक पहुँचे इसके पहले एचपीपीसीएल को कुछ नये आंकड़े लाने थे। उन्होंने टेस्ट चेककरवाए। उस हिसाब से भी 12 लाख 65 हजार पेड़ की गिनती बनती थी। इस आंकड़े से भी बांध परियोजना को फॉरेस्ट क्लीयरेंसमिलने में बाधा थी। ऐसे में एचपीपीसीएल के नौकरशाह नई चाल चल रहे हैं। डूब क्षेत्र में आने वाले किसानों की जमीनों पर खड़े पेड़, चारागाहों की जमीनों पर खड़े पेड़, ग्रामसभा और सरकारी जमीनों पर खड़े पेड़ों गिनती कम करने की फिराक में लग हुए हैं। ले-देकर फिर बचा केवल रिजर्व फॉरेस्ट का एरिया और वन्य जीव अभ्यारण्य का क्षेत्र और उन पर फैले 1 लाख 51 हजार 439 पेड़। अब नये आंकड़ों को निकालने के लिए पेड़ों की फिर से गिनती हो रही है। जोड़-तोड़कर एचपीपीसीएल बांध परियोजना पर फॉरेस्ट क्लीयरेंस लेने की कोशिश में लगा हुआ है।

ऐसे में एचपीपीसीएल की एक और नई साजिश देखने में रही है कि वह लोगों को जल्दी से जल्दी मुआवजा देना चाहता है ताकि लोगों के लालच को उभारा जा सके। जिन गांवों में एचपीपीसीएल के अनुसार पेड़ों की गिनती पूरी हो चुकी है उनको जल्दी से जल्दी मुआवजा देने की कोशिश की जा रही है। क्योंकि ऐसे में गांव वालों को यह लगता है कि अब मुआवजा मिल ही चुका है, तो ये पेड़ सरकारी हो चुके हैं। इन पेड़ों को नौकरशाहों के मुह लगे ठेकेदार काटें इससे पहले ही वे खुद काट लेते हैं। ये ऐसी सुनियोजित साजिश है जिसमें पेड़ गांव के लोग खुद ही काट रहे हैं और एचपीपीसीएल के बांध परियोजना में बाधा जंगल और पेड़ों की गिनती अपने आप कम होती जा रही है।

एचपीपीसीएल को इस बांध परियोजना के लिए अभी कई वैधानिक मंजूरियों की जरूरत है। इसके बावजूद भूमि अधिग्रहण की धारा 17(4) के तहत जमीन अधिग्रहण की जा रही है। यह धारा सभी तरह आपत्तियों को दरकिनार करते हुए तत्काल जमीन अधिग्रहण का रास्ता साफ करती है। देश में 18 से ज्यादा ऐसे कानून हैं जिनसे सरकारें जमीन अधिग्रहण करती हैं। हजारों बांध परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण करके लाखों हेक्टेयर जंगल हम डूबो चुके हैं। मजेदार बात यह है कि आजादी के 64 साल बाद भी वन या जंगल क्या होता हैइसकी कोई परिभाषा नहीं बनाई जा सकी है। कोई क्षेत्र वन क्षेत्र क्यों होता है और वन क्षेत्र कैसे घोषित किया जाता है। इसका पर्यावरण और वन मंत्रालय के पास कोई जवाब नहीं है। अभी हाल ही में एक आरटीआई में मांगी गई सूचना के जवाब में पर्यावरण मंत्रालय के ग्रीन इंडिया मिशनके संयुक्त सचिव बृजमोहन सिंह राठौर का कहना है कि हम अब भी वनों की परिभाषा पर काम कर रहे हैं और एक बार यह परिभाषा तय हो जाने के बाद बता दिया जाएगा। पर्यावरण और वन मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि भारतीय वन कानून 1927 वनों को परिभाषित नहीं करता और जंगलों कानूनी सीमा अधिसूचनाओं की प्रक्रिया पर निर्भर करती है। जरूरतों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के 1996 के फैसले के आधार पर वनों को परिभाषित किया जाता है। इस फैसले में कहा गया था कि शब्दकोश में दी गई परिभाषा या किसी सरकारी दस्तावेज में वनों के नाम से दर्ज भूमि के रिकार्ड के आधार पर किसी इलाके को वन माना जा सकता है। हास्यास्पद बात यह है कि वनों की कोई मान्य परिभाषा होने के बावजूद देश में वानिकी मिशन (ग्रीन इंडिया मिशन) को मंजूरी दी गई है। यह मिशन जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना आठ परियोजनाओं में से एक है। ग्रीन इंडिया मिशनपर 450 करोड़ रुपए खर्च करके एक करोड़ हेक्टेयर भूमि को 2020 तक वनों से आच्छादित करने की बात करता है।

पेड़ों के लिए लम्बी लड़ाई लड़ रहे जेपी डबराल कहते हैं कि इंसानी लालच के चलते हमारी पेड़ों की अमूल्य धरोहर हमसे छीनती जा रही है। चंद पैसों के लिए हम पर्यावरण को बेच रहे हैं। किसी भी परियोजना में प्रतिपूरक वनीकरण एक मजाक जैसा ही है। रेणुका बांध की वजह से रहे 15 लाख पेड़ के प्रतिपूरण में 15 हजार पेड़ भी लगा लें तो बड़ी बात होगी। गिरि के डाऊनस्ट्रीम में पड़ने वाले कई कस्बों में पानी का संकट हो जाएगा। उद्योगपति सुबोध अभि जो जन एकता समिति से जुड़े हैं, कहते हैं कि अब तो यह बात साफ हो गयी है कि बांधों में गाद के साथ-साथ ही ऑर्गेनिक मटीरियल भी जमा हो जाते हैं और वे मीथेन गैस पैदा कर रहे हैं। बांध जितने पुराने होते हैं, मीथेन उत्सर्जन की मात्रा बढ़ती जाती है। पर्यावरण मंत्रालय इसको भी पर्यावरण मूल्यांकन में शामिल करने की बात तो करती है। पर करती नहीं।

दिल्ली - लालच

दिल्ली के इतिहास में एक रोचक प्रसंग दिल्ली के सुल्तान तुगलक के काल का है, जब उसने 1326 में दिल्ली से राजधानी उठाकर दौलताबाद (देवगिरी, अहमदनगर, महाराष्ट्र ) ले जाने का प्रयास किया था दिल्ली से 700 मील दूर दौलताबाद लोग जाने को तैयार नहीं थे, जो नहीं जाना चाहते उन्हें डंडे के जोर पर ले जाने का फरमान हुआ। हां दौलताबाद राजधानी तो बना नहीं पर इस तुगलकी फरमान से हजारों लोग रास्ते में मर गए और दिल्ली काफी वक्त के लिए उजाड़ हो गई थी।

दिल्ली अपने तुगलकी फरमान के उसी रास्ते पर चल रही है। दिल्ली से 250 किमी दूर रेणुका बांध दिल्ली में पानी की कमी को पूरा करने के लिए बनाया जा रहा है। पर लगता तो ऐसा है कि दिल्ली की प्यास शायद ही बुझाई जा सकती है। दिल्ली राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों का इस्तेमाल करके आसपास के इलाकों और प्रदेशों का पानी छीनकर प्यास बुझाने में लगी हुई है। भाखड़ा नांगल बांध, टिहरी बांध के बाद अब रेणुका बांध पर नजरें गड़ाए हुए हैं इसके साथ ही यमुना से पानी का और ज्यादा हिस्सा, उत्तराखंड में किसाऊ और लखावर-व्यासी बांध से भी पानी पाने की भी उम्मीद किए हुए है। दिल्ली मुख्यतः दौलताबाद यानी लम्बी दूरियों से आयात किये जाने वाले पानी पर निर्भर है। इसके बावजूद दिल्ली में लाइसेंस प्राप्त पानी के बॉटलिंग प्लांट, दिल्ली जल बोर्ड एवं रेलवे के प्लांट सहि, गोल्फ कोर्स, वाटर पार्क आदि बहुत सारी टाल जा सकने वाली जल आधारित गैर जरूरी गतिविधियों की अनुमति जारी है। ऐसे में दिल्ली लम्बी दूरी से पानी लाने को कैसे जायज ठहरा सकती है, जबकि ऐसे गैर-जरूरी पानी की खपत वाली गतिविधियों के जारी रहने की अनुमति है? भारत के सभी शहरों में दिल्ली में प्रति व्यक्ति जल आपूर्ति सबसे ज्यादा है। यहां जल आपूर्ति 200 लीटर प्रति व्यक्ति से ज्यादा है जबकि अगर अन्य शहरों पर नजर डालें तो बंगलुरु (74),चेन्नई (87). कोलकाता (130) और मुंबई (191) है। 11वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेजों में भी यह बात स्वीकार की गई है कि दिल्ली में प्रति व्यक्ति जलापूर्ति पेरिस से भी ज्यादा है। हांलाकि दिल्ली में पानी के वितरण की असमानताएं इन संख्याओं में दिखाई नहीं देती। सच तो यह है कि दिल्ली को जितना ज्यादा पानी मिलता है। यह उतना ही बेपरवाही से इसका इस्तेमाल भी करता है। दिल्ली जल बोर्ड के निजीकरण के लिए जोर देते समय दिल्ली जल आपूर्ति और सीवेज परियोजना )निरस्त( के तहत विश्व बैंक ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि दिल्ली का 40 प्रतिशत पानी पुराने और टूटे-फूटे पाइपों की वजह से बर्बाद हो जाता है। यानी दिल्ली लगभग 720 एमजीडी पानी की आपूर्ति करता है और नुकसान 288 एमजीडी का होता है। यह नुकसान ही रेणुका परियोजना से की जाने वाली जल आपूर्ति से ज्यादा है। तो इसका मतलब यह हुआ ि रेणुका बांध सिर्फ इसलिए बनाया जा रहा है कि पानी बर्बाद करने वाले इस बेपरवाह शहर के लीकेज और नुकसान की भरपाई की जा सके।

पर जब विनाशकाले विपरीत बुद्धि हो तो ...?

रेणुका परियोजना से प्रभावित होने वाले 37 गांवों के लोग विस्थापन पुनर्वास और मुआवजे जैसे मुद्दे उठा रहे हैं पहले तो उन्हें परियोजना से जुड़े अधिकारियों के वादों पर यकीन था कि उन्हें अच्छे से अच्छा पुनर्वास और मुआवजा दिया जाएगा। बाद में जब उन्होंने देखा कि जमीन के बदले में कोई जमीन नहीं थी बस उनके नुकसान के लिए मात्र कुछ रुपयों की पेशकश की गई थी। अंत में जमीन की जो कीमत पेश की गई उससे तो लोगों का भ्रम पूरी तरह टूट गया। सिरमौर जिले में जहां एक बीघा जमीन का दाम 8-12 लाख के बीच था वहीं उन्हें पचास हजार से डेढ़ लाख प्रति बीघा की पेशकश की गई थी। यानी इतना थोड़ा पैसा कि वह अपनी जमीन खोकर उस पैसे से कहीं और जमीन खरीदने की स्थिति में नहीं थे। कुल मिलाकर देश में चल रही बाकी और परियोजना की तरह इन्हें भी बेघर और भुखमरी के जीवन में ढकेल दिया जाएगा। स्थानीय निवासियों ने अब रेणुका बांध का विरोध करने का पूरी तरह मन बना लिया है। अब उन्होंने इस परियोजना के आधार पर भी उंगलिया उठानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि अगर दिल्ली गिरि नदी का पानी इस्तेमाल करना ही चाहता है तो उसमें डैम बनाने की क्या जरूरत है यही पानी तो यमुना में बहकर दिल्ली तक जाता ही है। पर जब विनाशकाले विपरीत बुद्धि हो तो....?

- लेखक द्वय इंडिया वाटर पोर्टल हिन्दी से जुड़े हुए हैं।